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पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में योगदान Contribution in the field of environmental Preservation

चिपको आंदोलन

यह आंदोलन 1973 में प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुंदर लाल बहुगुणा के नेतृत्व में यह आंदोलन अत्यंत संघर्षशील रहा था उत्तराखंड के चमोली जिले के गोपेश्वरण में इसका उद्भव देवी नामक ग्राम में हुआ था।

पर्यावरण से संबंधित महत्वपूर्ण आंदोलन


तत्कालीन सरकार ने वहां वृक्षों को काटने का ठेका दिया था, जिसका विरोध दशौली ग्राम स्वराज मंडल नामक स्थानीय संस्था के तत्वावधान में आरंभ हुआ। इस आंदोलन में ग्रामीण महिलाओं ने सर्वाधिक प्रशंसनीय भाग लिया था। वह एक एक वृक्ष से लिपट कर उसे काटे जाने से रोकती थी।

यह आंदोलन सर्वाधिक रूप से गांधीवादी नीतियों के अनुसरण पर हुआ था, जो समग्र भारत में ही नहीं बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय चर्चा का भी विषय बना।

अपिको आंदोलन (सन् 1993)

यह आंदोलन सन् 1993 में हुआ , इस आंदोलन का नेतृत्व कर्नाटक के पांडुरंग हेगड़े ने किया था । चिपको आंदोलन की तरह यह भी महत्वपूर्ण आंदोलन सिद्ध हुआ।
कन्नड़ भाषा में अपिको का अर्थ चिपको ही होता है । आन्दोलन में भी पेड़ों से चिपक कर उनकी रक्षा की गई थी।

पश्चिमी घाट बचाओ आंदोलन (सन् 1988)

पश्चिमी घाट की पर्यावरणीय समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए इस आंदोलन का जन्म हुआ था। इस आंदोलन को इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योक इसमें पर्यावरणविदों , लेखकों, तथा समाज सेवी लोगों के पदयात्रा जुलूस में जो महाराष्ट्र से आरंभ होकर गोवा, कर्नाटक तथा तमिलनाडु होते हुए केरल तक पहुचा था, हजारों लोगों ने भाग लिया था । यह यात्रा 1300 किलोमीटर की थी।

कर्नाटक आन्दोलन

यह आंदोलन 'समाज परिवर्तन समुदाय नामक संगठन द्वारा किया गया था। इसने सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका कर्नाटक सरकार के विरुद्ध दी थी।
कर्नाटक सरकार द्वारा 510 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में एक संयुक्त क्षेत्र की कम्पनी द्वारा वनीकरण कराना चाहती थी। इस संगठन का कहना था कि जंगलों पर आदिवासियों का अधिकार होना चाहिए। सरकार के इस निर्णय से आदिवासियों के जीवन का मौलिक अधिकार प्रभावित होता है।

शांत घाटी बचाओ आंदोलन

इस आंदोलन का उद्देश्य भारत के एकमात्र उष्ण कटिबंधीय सदाबहार क्षेत्र की रक्षा करना था इसका नेतृत्व 'केरल शास्त्र साहित्य परिषद' ने किया था।
यह क्षेत्र जैविक विविधता का भंडार है। यहां केरल सरकार द्वारा शान्त घाटी सिंचाई परियोजना प्रारम्भ की जा रही थी । अन्नतत: सरकार को यह क्षेत्र 'राष्टीय वन क्षेत्र घोषित करना पडा़ ।

नर्मदा आंदोलन

इस आंदोलन का नेतृत्व बाबा आम्टे तथा अन्य आर्य समाज के नेताओं ने किया। इसका उद्देश्य था इस क्षेत्र में बसे आदिवासियों को उजड़ने से बचाना ।

दून घाटी आन्दोलन

दून घाटी तथा मसूरी में खानों का विरोध इस कारण किया जा रहा था क्यो कि वहां चूने का खनन प्रर्यावरण को प्रदूषित करेगा । वहां के जंगल तथा फल देने वाले वृक्ष नष्ट हो गए।
रूरल लिटिगेशन एण्ड एम.एन.सेन्टर , देहरादून नामक संस्था ने खनन रोकने के लिए सर्वोच्च न्यायालय से कार्य बंद करने का स्टे प्राप्त कर लिया है।

मिट्टी बचाओ आंदोलन

वर्ष 1977 में यह आंदोलन मध्य प्रदेश में प्रारम्भ हुआ था। बांध के कारण अत्यंत जल-भराव तथा पानी खारा न होने देने के उद्देश्य से यह आंदोलन हुआ था। इसका एक मुद्दा किसानों को उचित मुआवजा कराना भी था।

कैगा अभियान

कर्नाटक के कैगा नामक स्थान पर नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र लगाने का विरोध सन् 1984 से हो रहा है। सरकार यहां संयंत्र लगाने को कटिबद्ध दिखाई देती है, इस संयंत्र का निर्माण कार्य निरंतर चल रहा है।
स्थानीय किसानों , मछुआरों, तथा सुमारी उत्पादकों द्वारा ही नहीं लेखक पत्रकारों द्वारा भी इसका विरोध किया जा रहा है।

जल बचाओ जीव बचाओ आंदोलन

व्यवहारिक मछली मार कम्पनियों द्वारा मत्स्य उद्योग के अति दोहन के विरोध में यह आंदोलन मछुआरों की राष्ट्रीय संस्था द्वारा आरंभ किया गया था। इसका उद्देश्य मछलीमार कम्पनियों द्वारा किते जाने वाले व्वावसायिक शोषण  के फैलते प्रदूषण को रोकना था।
इस आंदोलन के अन्र्तगत सम्पूर्ण समुंद्र तट जो बंगाल से गुजरात तक तथा दक्षिण में कन्या कुमारी तक फैली हुई है।

टिहरी बांध विरोधी आंदोलन

प्रसिद्ध पर्यावरणविद् पं. सुन्दर लाल बहुगुणा के नेतृत्व में बनी संघर्ष समिति ने इस बांध का विरोध इसके निर्माण के प्रारंभ से ही करना आरंभ कर दिया था।

इस क्षेत्र में 20 अक्टूबर 1991 में जब भूकम्प आया तब से इसका विरोध और तेजी से होने लगा । यह बांध रूस की सहायता से बनाया गया था ।

बेड़वी आंदोलन

इस आंदोलन में कर्नाटक सरकार को प्रतावित जल विद्युत परियोजना बन्द करनी पड़ी। पर्यावरणविदों द्वारा इसका विरोध इसलिए किया गया था क्योंकि इसके कारण आस पास के क्षेत्र जहां मसालों के बागान हैं वे डूब जाते हैं।

यूरिया संयंत्र निर्माण का विरोध

मुम्बई में 25 किमी. थाल बैसढ़ में संसार का सबसे बड़ा यूरिया संयंत्र लगाया जा रहा था। इसका उद्देश्य मुम्बई को प्रर्यावरण प्रदूषण से बचाना था।

इन्द्रावती नदी बांध आंदोलन

महाराष्ट्र में इन्द्रावती नदी पर भोपाल पट्टनम एवं ईचाम पतली बांधों का निर्माण कार्य इस आन्दोलन के कारण रोक देना पड़ा। इस आंदोलन का नेतृत्व आदिवासियों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा राजनीतिज्ञों ने 'जंगल बचाओ, मानव बचाओ' नामक संगठन के नेतृत्व में किया था।

मोगली उत्सव क्या है

मोगली उत्सव को मोगली बाल उत्सव के नाम से जाना जाता है। यह पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र से संबंधित एक महत्वपूर्ण आयोजन है जो बच्चों को पर्यावरण के क्षेत्र में जागरूक करने के उद्देश्य से आयोजित किया जाता है।

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