जंतुओं में जनन (Reproduction in Animals)

इस पोस्ट में बात करेंगे, जंतुओं में जनन या प्रजनन के बारे में यह नोटस्  एससीईआरटी कक्षा 8 की पुस्तक व‌ एनसीआरटी कक्षा 8 की पुस्तक से बनाया गया है। जो कि यह टाॅपिक कक्षा 10, 12 की बोर्ड परीक्षाओं में व प्रतियोगी परीक्षाओं में इस टाॅपिक से प्रश्न बहुतायत में पूछे जाते हैं। इस लिए यह टाॅपिक परीक्षा की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है।

जंतुओं में जनन / प्रजनन

प्रजनन सजीवो का मुख्य लक्षण है या एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। अपनी प्रजाति का अस्तित्व बनाए रखने के लिए प्रत्येक जीव अपने जैसा जीव की उत्पत्ति करता है। जीवो के इस क्रिया को जनन कहते हैं। जंतुओं में जनन की दो प्रमुख विधियां हैं-
1. अलैंगिक जनन
2. लैंगिक जनन

अलैंगिक प्रजनन क्या है

जंतुओं में बिना जनन अंग के प्रजनन की विधि को अलैंगिक जनन कहते हैं। यह कई प्रकार से होता है। जैसे - मुकुलन द्वारा, द्विखण्डन द्वारा।

हाइड्रा में अलैंगिक जनन होता है। परिपक्व हाइड्रा के शरीर में एक या एक से अधिक उभार दिखाई देते हैं, यह मुकुल है। यह परिपक्व होकर जनक हाइड्रा से अलग हो जाता है और नये हाइड्रा का रूप ले लेता है। इस प्रकार जाति की निरंतरता बनाए रखने के लिए जनक द्वारा प्रजनन की क्रिया सम्पन्न होती है। इस क्रिया में किसी भी प्रजनन अंग की आवश्यकता नहीं होती। अलैंगिक जनन की विधि मुकुलन कहलाती है।

अलैंगिक जनन की विधि मुकुलन


अमीबा एक कोशिकीय जंतु है। इसके कोशिका के मध्य में केंद्र होता है। केंद्रक परिपक्व होकर दो भागों में बांट जाता है। जिससे प्रजनन की क्रिया प्रारंभ हो जाती है। अंत में अमीबा का शरीर दो भागों में बढ़ जाता है, प्रत्येक भाग में विभाजित केंद्र मौजूद रहते हैं।

इस प्रकार से एक ही जनक अमीबा दो संतान उत्पन्न करता है परिपक्व शरीर को दो भागों में बांट कर अमीबा अपना अस्तित्व खो देता है। प्रत्येक भाग विकसित होकर पुनः दो भागों में बट जाता है। इस प्रकार के अलैंगिक प्रजनन को जिसमें कोई एक जीव जीवित होकर दो संतति उत्पन्न करता है, द्विखण्डन कहलाता है।

अमीबा में द्विखंडन विधि से अलैंगिक जनन



अमीबा के अतिरिक्त कुछ जीवो में मलेरिया परजीवी (प्लाज्मोडियम) आदि  में जनन वह विभाजन के द्वारा होता है।

लैंगिक जनन क्या है

लैंगिक जनन के लिए नर तथा मादा जननांगों का होना अनिवार्य है अधिकांश जंतु जैसे- मछली, मेंढक, गाय, बकरी तथा मनुष्य आदि में नर एवं मादा जनन अंग अलग-अलग पाये जाते हैं, ऐसे जंतुओं को एक लिंगी जंतु कहते हैं । दूसरी ओर कुछ जंतुओं जैसे केंचुआ, जोक आदि में नर एवं मादा जनन अंग एक ही जंतु में पाया जाते हैं ऐसे जंतुओं को द्विलिंगी जंतु कहते हैं।

नर जननांग में नर युग्मक तथा मादा जननांग में मादा युग्मक बनते हैं। निषेचन क्रिया के फल स्वरुप नर एवं मादा युग्मक संलयन करके युग्मनज का निर्माण करते हैं। यही युग्मनज वृद्धि एवं विकास कर के नए जीव का निर्माण करते हैं।

मानव के जननांग एवं निषेचन

मनुष्य के नर जननांग

पुरुषों में उदर के नीचे अंडा के आकार का एक जोड़ा वृषण होता है। जो नर युग्मक अर्थात शुक्राणु उत्पन्न करता है। इससे जुड़ी हुई एक जोड़ी शुक्र नलिका होती है। जिससे शुक्राणु गति करता हुआ शिशन के माध्यम से बाहर निकलता है। शुक्राणु लाखों की संख्या में एक साथ निकलते हैं। यह सूक्ष्म तथा एक कोशिकीय संरचना होती है।

मनुष्य के नर जननांग


मनुष्य के मादा जननांग

स्त्रियों में नाभि के नीचे शरीर के अंदर मादा जनन अंग स्थित होते हैं। इन अंगों में एक जोड़ा अंडाशय, एक जोड़ा अंडवाहिनी तथा एक गर्भाशय होता है। अंडाशय में अंडाणुओ का निर्माण होता है। अंडाणु भी एक कोशिकीय संरचना होती है।

मनुष्य के मादा जननांग


निषेचन की प्रक्रिया

अंडर वाहिनी में शुक्राणु आकर अंडाणु से मिलते हैं इस मिलने की क्रिया  निषेचन कहलाती है। निषेचन के बाद गति करते हुए गर्भाशय में आकर रोपित हो जाता है। निषेचित अंडाणु को युग्मनज कहते हैं। 

निषेचन की प्रक्रिया



मनुष्य एवं अन्य जंतुओं जैसे गाय भैंस बकरी बिल्ली कुत्ता आदमी निषेचन क्रिया मादा के शरीर के अंदर होता है ऐसे निषेचन को आंतरिक निषेचन कहते हैं। इसके अतिरिक्त अधिकतर अकशेरुकी जंतुओं में मछली मेंढक आदि में शुक्राणुओं तथा अंडाणुओं को जल में विसर्जित किया जाता है और जल में शुक्राणु अंडाणु से मिलते हैं इस प्रकार के निषेचन को जंतु के शरीर से बाहर होता है उसे वाह्य निषेचन कहते हैं।

भ्रूण का परिवर्धन 

निषेचन के परिणाम स्वरूप युग्मनज बनता है युग्मनज की कोशिकाएं विभाजित होने लगती हैं जो परिवर्धित होकर भ्रूण में बदल जाता है। इस अवस्था में शिशु का सिर पैर नाक आंख आदि कुछ अंग विकसित हो जाते हैं। जब भ्रूण विकसित होते हुए शरीर के सभी अंगों का निर्माण कर लेती है। तब यह अवस्था गर्व कहलाता है। गर्भ का विकास पूरा हो जाने पर मां शिशु को जन्म देती है।

नवजात शिशु का जन्म नर एवं मादा युग्मकओं के संलयन के फलस्वरूप होता है जिसके कारण शिशुओं में माता एवं पिता दोनों के लक्षण पाए जाते हैं।

जरायुज एवं अण्डयुज

कुछ जंतु शिशु को जन्म देते हैं और कुछ अंडे देते हैं जो बाद में शिशु में विकसित होते हैं। बच्चे देने वाले जंतुओं को जरायुज कहते हैं‌। जैसे मनुष्य, गाय, बकरी, कुत्ता, चमगादड़ तथा बैल आदि तथा अंडा देने वाले जंतुओं कौन दे विच कहते हैं जैसे मुर्गी, कबूतर, सर्प, मछली तथा मेंढक आदि।

जंतुओं में जनन से संबंधित महत्वपूर्ण बिंदु

  • जंतुओं में प्रजनन की दो विधियां हैं लैंगिक तथा अलैंगिक जनन
  • वृषण, शुक्रवाहिका का तथा शिश्न नर जनन अंग है। अंडाशय अंण्डवाहिनी एवं गर्भाशय मादा जनन अंग है।
  • अण्डाशय से द्वारा उत्पन्न युग्मक अंडाणु तथा वृषण द्वारा उत्पन्न युग्मक शुक्राणु कहलाता है। शुक्राणु तथा अंडाणु का संलयन निषेचन कहलाता है। तथा निषेचित अण्डाणु युग्मनज कहलाता है।
  • मादा के शरीर के अंदर होने वाला निषेचन आंतरिक निषेचन तथा शरीर के बाहर होने वाला निषेचन बाह्य निषेचन कहलाता है।
  • निषेचित अंडा गर्भाशय में रोपित हो जाता है और यही इसका विकास होता है। जिसके फलस्वरूप नवजात शिशु जन्म लेता है।

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