पौधों एवं जन्तुओं में अनुकूलन

जन्तुओं में अनुकूलन

पौधों एवं जन्तुओं में अनुकूलन, उन्हें अपने आसपास के वातावरण में जीवित रहने में मदद करता है। पौधे एवं जन्तु अपने आवास की परिस्थितियों के अनुसार अनुकूलित होते हैं।

हमारे परिवेश में अनेक प्रकार के जीव-जन्तु पाये जाते हैं। ये जीव -जन्तु अलग अलग जगह पर रहते हैं। कोई भी जीव उसी स्थान पर रहना पसंद करता है जहां उसे पर्याप्त सुरक्षा, भोजन तथा अनुकूल दशाएं मिलती है। इन जगहों को जन्तुओं का वास स्थान कहते हैं। वास स्थान के आधार पर जीवों को चार भागों में बांटा गया है–

  1. थलचर (Terrestrial) – कुछ जन्तु स्थल पर पाए जाते हैं जैसे- कुत्ता , बिल्ली आदि । इन्हें थलचर कहते हैं।
  2. जलचर (Aquatic) – कुछ जन्तु जल में पाये जाते हैं, जैसे- मछली । इन्हें जलचर कहते हैं।
  3. नभचर (Aerial) – कुछ जन्तु आकाश में उड़ते हैं, उन्हें नभचर कहते हैं। जैसे- कौआ , गौरैया, चील आदि।
  4. उभयचर (Amphibian) – कुछ जन्तु जल एवं थल दोनों स्थानों में वास करते हैं जैसे- कछुआ, मेंढ़क, आदि। ये उभयचर कहलाते हैं।

आवास एवं अनुकूलन

प्रत्येक जीव में उसके परिवेश के अनुरूप तालमेल स्थापित करने के लिए होने वाले परिवर्तन को अनुकूलन कहते हैं। जीवों में निम्नलिखित कारणों से अनुकूलन होता है–

  • भोजन की उपलब्धता
  • वातावरण
  • प्रजनन
  • शत्रुआओं से रक्षा

   
अनुकूलन के कारण ही कुछ जन्तु थल पर और कुछ जल में अपना वास स्थान बनाते हैं। प्रत्येक  जन्तु में कुछ विशिष्ट लक्षण या शारीरिक संरचनाएं होती है। यह उन्हें स्थान विशेष में रहने में मदद करती है। आओ जाने कि कि तरह तरह के जन्तु किस प्रकार विभिन्न वातावरण (परिवेश) में अपने को अनुकूलित रखतें हैं।

जल में रहने वाले जन्तु

जल में रहने वाले जन्तु जलीय जन्तु कहलाते हैं, जैसे – मछली, आक्टोपस, आदि

मछली का शरीर नाव के आकार का होता है। इसके दोनों शिरे नुकीले और बीच वाला भाग चौड़ा होता है। इस तरह की आकृति को धारा-रेखित कहते हैं। धारा रेखित शरीर तैरने में सहायक होता है।

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मछली के शरीर पर पंख होते हैं। इनकी सहायता से यह तैरती है। मछली  की पूंछ और पंख पतवार की तरह काम करती है।मछली में सांस लेने हेतु फेंफड़ों के स्थान पर गलफडे (गिल्श) हैं।गलफडे , पंख तथा धारा रेखित शरीर मछली को जल में रहने के लिए अनुकूल बनाते हैं।

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मछली बार बार अपना मुंह खोलती और बंद करती है।क्यो ?

मछली के मुह में जल प्रवेश करता है और गलफड़ों से बाहर निकल जाता है। जल में घुली हुई आक्सीजन को गलफडें सोख लेते हैं।इस तरह मछली श्वसन करती है।

इसी तरह मेंढ़क तथा बत्तख के पैरों को देखें । उनके पैरों की अंगुलियों के बीच झिल्ली का पाद- जाल है । यह जाल इन्हें जल में तैरने में पतवार की तरह सहायता करता है।

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स्थल में रहने वाले जन्तु
जमीन पर रहने वाले जन्तु स्थलीय जन्तु कहलाते हैं। स्थलीय वास स्थान में कई विविधतायें है जैसै घास के मैदान, घने जंगल वाले क्षेत्र एवं पर्वतीय क्षेत्र आदि।

मैदानी भाग में रहने वाले जन्तु

शेर, हिरन, हाथी वन अथवा घास स्थल में रहता है ।शेर एक शक्तिशाली जन्तु है जो हिरन जैसे जानवरों का शिकार करता है । शेर का मट्मैला रंग उसे घास के मैदान में छिपने में मदद करता है।

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हिरन भी मैदानी क्षेत्र में रहने वाला जन्तु है। पौधों के कठोर तनों को चबाने के लिए उसके मजबूत दांत होते हैं। उसके लम्बे कान तथा सिर के बागल में स्थित आंखे उसे खतरों की जानकारी देती हैं। उसकी तेज गति उसे शिकारी से दूर भागने में मदद करती है।

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हिरन


मरूस्थल में रहने वाले जन्तु

नीचे दिए गए चित्र में कुछ जन्तु एवं उनके पैरों के चित्र दिए गए हैं।ध्यान से तथा उनकी तुलना ऊंट के पैरों से करिए । आप क्या अन्तर देखते हैं?

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ऊंट के कूबड में भोजन चर्वी (वसा) के रूप में संचित रहता है। भोजन न मिलने पर ऊंट इसी कूबड़ में संचित वसा का उपयोग करता है। ऊंट रेगिस्तान में कई दिनों तक बिना पानी के भी जीवित रह सकता है।यह अपने आमाशय में स्थित विशेष थैलियों में पानी संचित कर लेता है।

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ऊंट को रेगिस्तान का जहाज क्यो कहा जाता है?

रेगिस्तान में ऊंट सामान पहुंचाने तथा यातायात के साधन के रूप में बहुत उपयोगी होते हैं ऊंट के पैर लम्बे तथा गद्दीदार होते हैं।इसक इ पैरों के लक्षण उसे मरूस्थल की रेतीली भूमि पर चलने अथवा दौड़ने में सहायता करते हैं, इस लिए ऊंट को रेगिस्तान का जहाज कहते हैं।

पर्वतीय क्षेत्र में पाये जाने वाले जन्तु

पर्वतीय क्षेत्र में सामान्यतः बहुत ठण्ड पड़ती है। सर्दियों में तो बर्फ भी गिरती है।पर्वतीय क्षेत्रों में कुछ विशिष्ट जन्तु  जैसे याक, भेड़, पहाड़ी बकरी, तथा भालू आदि पाते जाते हैं।यह  जन्तु  वहां के ठण्डें वातावरण में रहने के लिए उनके शरीर की त्वचा बहुत मोटी होती है। मोटी त्वचा के नीचे वसा की परत और त्वचा के ऊपर घने एवं लम्बे बाल पाये जाते हैं। लम्बे बाल इन्हें अत्यधिक सर्दी में ठंड से बचाते हैं।

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याक


उड़ने वाले जन्तु

प्रत्येक पक्षी के शरीर में एक जोड़ी पंख होते हैं,जो उन्हें उड़ने में सहायता करते हैं। इनकी पुंछ इन्हें उड़ते समय दिशा बदलने तथा नीचे उतरने में सहायता करती है। पक्षियों की छाती की मांसपेशियां बहुत मजबूत हैं जो इनके पंखों को ऊपर नीचे गति करने में सहायता करती है। इनकी हडि्डयां हल्की तथा खोखली होती है।शरीर की आकृति धारा – रेखित होती हैं। इस प्रकार की शारीरिक रचना पक्षियों के उड़ने में सहायता करती है।

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नोट- 
अनेक प्रकार के सर्प, मकड़ियां, चूहे, कीट, व छिपकली आदि पत्थरों के नीचे या छोटे छिद्रो  और दरारों में रहते हैं। इन जन्तुओं में अधिकांश की त्वचा मोटी होती है, जो शरीर से पानी के ह्रास को रोकती है।

घोंसलों से पक्षियों की पहचान
     
      क्या आपने कभी किसी पक्षी का  घोसघों देखा है? पक्षी अण्डे देेेने
तथा उसकी सुरक्षा के लिए घोसला बनाते हैं। आम तौर पर पक्षी अपना घोंसला पेड़ की शाखाओं पर छोटी छोटी टहनियों, घास, बाल,रूई, कपड़े के रेशे आदि की मदद से बनाते हैं। कुछ पक्षी अपना घोंसला ,गड्डे, झाड़ियों, पेड़ की कोटर , चट्टानों के बीच या हमारे घरों में बनाते हैं।

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पौधों में अनुकूलन

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क्या आप जानते हैं

  • कमल का पौधा जल में कैसे रह पाता है ?
  • नागफनी के पौधों में कांटे क्यों पाते जाते हैं ?

वह स्थान विशेष जिसमें कोई पौधा उगता है व वृद्धि करता है, उसका वास स्थान कहलाता है। अलग-अलग स्थानों में उगने वाले पौधों की रचना भी  एक दूसरे से भिन्न होती है। अपने वास स्थान के अनुसार पौधें अपने विभिन्न भागों जड़ ,तना व पत्ती की संरचना में परिवर्तन कर लेते हैं। इसे ही अनुकूलन कहते हैं।

ऐसे पौधों की विशेषताएं-

जलीय पौधे- चित्र में बने कमल , कुमुदिनी व जलकुंभी के पौधे हैं। जो तालाब में पाये जाते हैं। इनके तने लम्बे, पतले, मुलायम व हल्के हैं।
जिनमें वायु भरी होती है। वायु भरी होने के कारण ये हल्के व मुलायम होते हैं और पानी में तैरते रहते हैं। इनकी पत्तियां हरी व चपठी होती हैं। इनकी सतह मोम जैसी चिकनी होती है। इस कारण इन पर पानी नहीं रूकता और ये सड़ती नहीं है।

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जलीय पौधे

मरूस्थलीय पौधे-
मरूस्थलीय स्थानों में पानी की कभी होती है। यहां पाए जाने वाले पौधे जैसे – नागफनी, सतावर, की पत्तियां कंटीली होती हैं। कंटीली पत्तियों से वाष्पोत्सर्जन की क्रिया बहुत कम होती है। इनका तना हरा, चपटा व गूदेदार होता है। चपटा गूदेदार तना भोजन बनाने तथा पानी संचित करने का कार्य करता है । ऐसा करने से पानी की कभी में भी पौधा जीवित रह पाता है।
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मरुस्थलीय पौधे


पर्वतीय पौधे- 
पर्वतीत क्षेत्रों में पाए जाने वाले वृक्ष सदैव हरे भरे रहते हैं। इन्हें सदाबहार वृक्ष कहते हैं। जैसे- चीड़, देवदार,। इन वृक्षों की आकृति शक्वाकार होती है। इनकी पत्तियां सुई की तरह नुकीली होती है। ऐसी संरचना के कारण पहाड़ों पर गिरने वाली वर्फ इन वृक्षों पर नहीं रूक पाती और पेड़ सदैव हरे भरे रहते हैं

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