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संक्रामक रोग एवं उनकी रोकथाम

         संक्रामक रोग एवं उनकी रोकथाम




भोजन में पोषक तत्वों की कमी हो जाने से  कई कुपोषणजनित रोग हो जाते हैं। कुछ रोग विटामिनों की कमी से भी होते हैं।

कुछ रोग ऐसे भी होते हैं जो किसी रोगी व्यक्ति के सम्पर्क में आने पर स्वस्थ व्यक्ति को रोगग्रस्त बना देते हैं।इन रोगों को संक्रामक रोग कहते हैं।

संक्रामक रोग अत्यनत छोटे जीवों के द्वारा होते हैं । इन्हें रोगाणु कहते हैं रोगाणुओं को हम अपनी आंखों से नहीं देख सकते हैं। इन्हें देखने के लिए सूक्ष्मदर्शी की सहायता लेनी पड़ती है। रोगाणु सीधे सम्पर्क के अतिरिक्त दूषित जल, दूषित भोजन, दूषित मिट्टी, दूषित वायु, मक्खी व मच्छरों आदि द्वारा भी फैलते हैं। रोगाणु। सूक्ष्म जीवी होते हैं। ये मुख्यता तीन प्रकार के होते हैं।
1. विषाणु (वायरस)
2. जीवाणु (बैक्टीरिया)
3.प्रोटोजोआ (एक कोशिकीय जीव)

संक्रामक रोग रोगाणु का प्रकार
जुकाम  विषाणु
खसरा विषाणु
चेचक विषाणु (मिजीलस वायरस)
तपेदिक (टी.बी) जीवाणु (माइको बैक्टीरियम ट्यूवरकुलेसिस)
निमोनिया जीवाणु( डिप्लो काक्स न्यूमोनी)
हैजा जीवाणु (विब्रियो कावेरी)
पेंचिस प्रोटोजोआ शिगेला डिसेन्ट्री)
मलेरियाप्रोटोजोआ, (एनाफिलीज मच्छर),
डेंगू विषाणु (मादा एडीज मच्छर
ऐडस विषाणु 
स्वाइन फ्लू विषाणु ( सूअर द्वारा)


संक्रामक रोगों को फैलने से रोकने की विधियां एवं सावधानियां-


संक्रामक रोग विभिन्न माध्यमों से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक फैलते हैं।यदि इन पर समय रहते नियन्त्रण नहीं किया गया तो ये महामारी का रूप ले सकते हैं। जब एक क्षेत्र में बहुत से लोग एक ही रोग से ग्रसित हो जाते हैं तो इसे महामारी कहते हैं।

संक्रामक रोगों को फैलने से किस प्रकार रोका जा सकता है-

1. सम्पर्क एवं हवा के माध्यम से फैलने वाले रोगों की रोकथाम-(रोग- खसरा, चेचक, तपेदिक, जुकाम आदि)
  • रोगी को अलग एक स्वच्छ कमरे में रखना चाहिए।
  • रोगी का विस्तर कपड़े तथा बर्तन अलग होने चाहिए।
  • रोगी का मल-मूत्र , थूक आदि को राख से ढक देना चाहिए तथा बाद में जला देना चाहिए।
  • जुकाम से पीड़ित रोगी को छींकते समय या खांसते समय मुंह रुमाल से ढक लेना चाहिए।
  • रोगी को नजदीक के अस्पताल में ले जाना चाहिए।
2. दूषित भोजन एवं पानी के माध्यम से फैलने वाले रोगों की रोकथाम ( रोग- हैजा,  टाइफाइड, पीलिया, पेेेचिश, आदि)
  • गर्म एवं ताजा भोजन ग्रहण करना चाहिए।
  • बाजार का खुला भोजन तथा देर से रखे हुए कटे फल नहीं खाना चाहिए।
  • भोजन एवं जल ढक कर रखनी चाहिए।
  • 2 से 3 दिन पहले एकत्रित किए गए जल पीने में उपयोग नहीं करना चाहिए।
  • खाने से पहले और बाद में हाथ साबुन या राख से अच्छी तरह से धो लेना चाहिए।
  • शौच के बाद हाथों को साबुन से या राख से अच्छी तरह से धो लेना चाहिए।
  • नाखून साफ रखने चाहिए। उन्हें समय-समय पर काटना चाहिए।
  • घर के अंदर एवं बाहर की सफाई रखनी चाहिए।
  • कूड़ेदान का प्रयोग करना चाहिए।
  • पानी कम-से-कम 20 मिनट तक उवालने के पश्चात ठण्डा करके पीना चाहिए।
  • प्रति रोधक टीके लगवाएं
  • हैजा एवं पेंचिस के रोगी को पुनर्जलीकरण विलयन या जीवनरक्षक घोल पिलाना चाहिए।  
जीवन रक्षक घोल कैसे बनाएं
  1. सबसे पहले पानी उबालना चाहिए।
  2. उबले पानी को ठंडा कर लें
  3. फिर एक गिलास में दो चम्मच चीनी और चुटकुले भर नमक घोल कर जीवन रक्षक घोल बनाया जा सकता है।
3. मक्खियों तथा मच्छरों से फैलने वाले रोगों से रोकथाम- (रोग- मलेरिया, डेंगू आदि )
  • कमरों की नियमित सफाई करना चाहिए।
  • समय-समय पर कमरों में कीटनाशक दवाओं का छिड़काव सावधानी से करना चाहिए।
  • शौचालय एवं नल अथवा हैण्डपम्प का स्थान स्वच्छ रखना चाहिए।
  • सोते समय मच्छर दानी का प्रयोग करना चाहिए।

टीकाकरण एवं ड्राप पिलाना 

कुछ रोगों के रोकथाम का उपयुक्त समय टीके लगना तथा ड्राप पिलाना है। इससे शरीर में रोगों से लड़ने की क्षमता उत्पन्न हो जाती है। टीकों एवं ड्रांप का प्रयोग समय से कर लेने पर कई घातक रोगों से हम अपना बचाव कर सकते हैं । ये ड्राप एवं टीके सभी प्राथमिक स्वास्थय केन्द्रो पर निह्शुलक पिलाते जाते हैं जैसे- पोलियो ड्रॉप, चेचक, काली खांसी, टिटनेस, और खसरे आदि के टीके । बच्चों को जन्म के समय बी.सी.जी. का टीका अवश्य लगवाना चाहिए।

                              प्रतिरक्षण चार्ट

आयु टीका
जन्मबी.सी.जी. का टीका, पोलियो की पहली  खुराक 
6 सप्ताह डीपीटी-1, हेपेटाइटिस, पोलियो की दूसरी  खुराक 
10 सप्ताह डीपीटी-2, हेपेटाइटिस बी. पोलियो की तीसरी खुराक 
14 सप्ताह डीपीटी-3, हेपेटाइटिस बी. पोलियो की चौथी खुराक 
9 महीना मिज़ल्स (खसरा), बिटामिन- ए
16 से 24 माह डीपीटी बूस्टर, पोलियो बूस्टर, बिटामिन- ए
2 से 5 वर्ष  प्रत्येक छह माह पर बिटामिन- ए
5 से 6 वर्षडीपीटी बूस्टर, पोलियो बूस्टर

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